कहा से शुरू करू समझ में नहीं आता, लिखने बैठता हू तो लगता है मानो किसी पंछी को २४ साल के बाद उन्मुक्त आकाश मिला हो .... बस उड़ने को जी चाहता है ..चलिए शुरू करता हूँ लिखने के शौक से ..कुछ सुनने और सुनाने के शौक से ...आज मै अपनी लिखी सबसे पहली पंक्तियाँ यहाँ पर लिख रहा हू ..... यकीनन १९९७ की डायरी से निकल कर २००८ के इन्टरनेट युग तक आते आते बहुत समय लग गया इन्हें...ये पंक्तिया मैंने लिखी थी अपने पिता के निधन के बाद ...उस अजीब सी उदासी के साए में जिनसे निकलने की शायद मै आज भी कोशिश कर रहा हू..
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है....
.न वो हसने की आवाज,न पायलों की झनक,
न वो बजते हुए साज न वो चूडियों की खनक
किसी ने हरे भरे पेड़ को बड़ी बेदर्दी से काटा है
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है ...
.न कदमो की आहट न आहटो की भनक,
न मुस्कुराना वो उनका , न वो चेहरे की चमक ,
किसी बच्चे को किसी बड़े ने बड़ी जोर से डाटा है,
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है.....
जाने के बाद भी आती है उनकी महक,
जाने क्यों रह रह उठती है ये कसक,
आज भी मेरा उनसे जन्मो का नाता है..
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है..
दिल कहता है तू आज उसी तरह चहक ,
सुबह के न सही शाम के सूरज सा दहक,
जैसे दर्पण में कोई खुद को निहारता है,
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है...
आज के लिए इतना ही ...
फिर मिलेंगे ...
पुनीत शुक्ला

5 comments:
ब्लॉग की दुनिया में आप भी , हार्दिक स्वागत!
उत्कट इक्छा आपके मन में है, और कोशिश भी की है, अच्छा लगा.
कभी समय मिले तो इस तरफ भी रुख़ कीजिये:
http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/
http://saajha-sarokaar.blogspot.com/
http://hamzabaan.blogspot.com/
बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति. शुक्रिया. सचमुच बहुत खूब.
स्वागत है आपका. आशा है यहाँ लिखते रहेंगे.
शहरोज जी,अमित जी,उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद...प्रयास करूँगा कि आप कि न सही तो कम से कम अपनी उमीदो पे खरा उतरू !
पुनीत,
बेटा, तुम एक दिन में ही इतने बड़े हो गए थे, मैं आज जान पाया। इन लाइनों का दर्द शायद मैं समझ पा रहा हूं, और सोच रहा हूं वो लम्हा जब दिल का दर्द लफ्जों की शक्ल में कागज़ पर उतरा होगा।
किसी अपने को खोने पर मैंने बहुत पहले दो लाइनें लिखीं थी, आज तुम्हारे साथ साझा करने का मन कर रहा है...
अश्कों से क्या समझोगे हाल ए दिल ज़िगर का,
आंखों तक आते आते रंग उड़ गया लहू का..
जुग जुग जियो...
भाई अच्छा लग रहा है ये देखकर की तुमने भी अपने विचारों को शब्दों का रूप दे दिया है...
पता नहीं एक शेर जेहन में बार बार गूँज रहा है...
खून-ए-दिल जाया ना हो मुझे बस इतनी फिक्र है..
अपने काम आया तो क्या गैरों के काम आया तो क्या....
दुआ करूंगा की तुम यूँही लिखते रहो...
Post a Comment