Sunday, September 20, 2009
देश का भविष्य
मैले कपड़ो में लिपटा वो;मांगता रेड लाइट पे भीख
फुटपाथ पे रेंगती जिन्दगी क्या यही है हमारे देश का भविष्य ?
अच्छे बुरे का एहसास नहीं उसको;देता तुम्हे अच्छे होने की सीख
किसी ढाबे में बाल श्रम करती जिन्दगी क्या यही है हमारे देश का भविष्य ?
टूटी साइकिल पर पानी ढोता वो ;मेहनताने के बदले पाता गाली और चीख
तंग गलियों में गोल घूमती जिन्दगी क्या यही है हमारे देश का भविष्य ?
नहीं उसे नहीं,देश नहीं ,युग नहीं ;अपने आप को बदलो
गलियों में,सडको पर,मोहल्लो में पलती ये ठोकरे हमे भी लगेगी वक्त से पहले संभलो
कर्तव्य,जिम्मेदारी,निष्ठां,ईमानदारी इन्हें अपनाओ खुद सुधरो बदलेगी तस्वीर ..........
बदलेगा देश का भविष्य ........
फिर मिलेगे
पुनीत
Friday, September 26, 2008
घर
दीवरो से नहीं अपनों से बनता है घर,गैरों से नहीं अपनों से बनता है घर ....
तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं लगता,न जाओ वापस आ जाओ लौटकर कहता है घर........
कैसे छोड़ दे एकदम से जिसे अपने खून से सींचा है,अपना सा प्यारा सा कुछ कहता हुआ जैसे लगता है घर ........
तुम मुझसे पराये क्यूँ हो गए ,ये सोंचता हुआ यही पूंछता हुआ फूट फूट कर रोता है घर ............
बाजार मै बिकने वाली कोई चीज नहीं है ये ,भावनाओ का आशाओ का अपेक्षाओं का घर होता है घर.........
दीवारो से नहीं अपनों से बनता है घर ...............
फिर मिलेंगे,
पुनीत शुक्ला
Wednesday, August 27, 2008
ख्वाब
लोग नींद न आने से परेशान है किन्तु हमारी परेशानी कुछ दूसरी है,हमे ख्वाब नहीं आते है.....
मुददते बीत गयी ख्वाब नहीं आते है,
बे-अदब है इन्हें आदाब नहीं आते है !
मेरी आँखों तुम्हे रोने का सलीका ही नहीं,सलीका ही नहीं ...
रोज रोज दरिया में सैलाब नहीं आते है !
ये भी एक किस्म का संगीन रोग है देखो,
नींद आती है मगर ख्वाब नहीं आते है,नींद आती है मगर ख्वाब नहीं आते है !
यूँ तो दुनिया ने यहाँ मौत बिछा रखी है,बिछा रखी है.....
कुछ हमे जीने के अंदाज नहीं आते है!
मुददते बीत गयी ख्वाब नहीं आते है,
बे -अदब है इन्हें आदाब नहीं आते है !
फिर मिलेंगे,
पुनीत शुक्ला
Sunday, August 24, 2008
कहा से शुरू करू समझ में नहीं आता, लिखने बैठता हू तो लगता है मानो किसी पंछी को २४ साल के बाद उन्मुक्त आकाश मिला हो .... बस उड़ने को जी चाहता है ..चलिए शुरू करता हूँ लिखने के शौक से ..कुछ सुनने और सुनाने के शौक से ...आज मै अपनी लिखी सबसे पहली पंक्तियाँ यहाँ पर लिख रहा हू ..... यकीनन १९९७ की डायरी से निकल कर २००८ के इन्टरनेट युग तक आते आते बहुत समय लग गया इन्हें...ये पंक्तिया मैंने लिखी थी अपने पिता के निधन के बाद ...उस अजीब सी उदासी के साए में जिनसे निकलने की शायद मै आज भी कोशिश कर रहा हू..
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है....
.न वो हसने की आवाज,न पायलों की झनक,
न वो बजते हुए साज न वो चूडियों की खनक
किसी ने हरे भरे पेड़ को बड़ी बेदर्दी से काटा है
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है ...
.न कदमो की आहट न आहटो की भनक,
न मुस्कुराना वो उनका , न वो चेहरे की चमक ,
किसी बच्चे को किसी बड़े ने बड़ी जोर से डाटा है,
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है.....
जाने के बाद भी आती है उनकी महक,
जाने क्यों रह रह उठती है ये कसक,
आज भी मेरा उनसे जन्मो का नाता है..
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है..
दिल कहता है तू आज उसी तरह चहक ,
सुबह के न सही शाम के सूरज सा दहक,
जैसे दर्पण में कोई खुद को निहारता है,
आज घर में अजीब सा सन्नाटा है...
आज के लिए इतना ही ...
फिर मिलेंगे ...
पुनीत शुक्ला
Tuesday, August 12, 2008
Armaan ko aaj bhi jid hai ki vo machal ke nikle......
Jaha daud lagani thi tahal ke nikle
Chand rangeen khilauno se bahal ke nikle..
Doob marne ke kayi mauke diye duniya ne hume
Hum ubhar aaye satah par bade halke nikle..
Door se noor ke nirjhar jo najar aate the
Paas jake dekha sabhi dhundhlke nikle..
Ye to bajar hai kharido ya becho kuch bhi
Hum bachaye hue emman sambhal ke nikle..
Jis sher ko sunkar sabhi shayar pareshan hue
Yakin jaane,vo sabhi sher meri gajal ke nikle..
Dil ne vo dard diya hai ki khuda khair kare
Armaan ko aaj bhi jid hai ki vo machal ke nikle......
