अब जब अपने विचारो को मूर्त रूप देने का बीडा उठाया तो पता चला कि विचारो कि अभिव्यक्ति कितनी मुश्किल होती है ...उन सभी को मेरा हार्दिक अभिनन्दन जो लेखक है या किसी न किसी रूप में लिखते है...
लोग नींद न आने से परेशान है किन्तु हमारी परेशानी कुछ दूसरी है,हमे ख्वाब नहीं आते है.....
मुददते बीत गयी ख्वाब नहीं आते है,
बे-अदब है इन्हें आदाब नहीं आते है !
मेरी आँखों तुम्हे रोने का सलीका ही नहीं,सलीका ही नहीं ...
रोज रोज दरिया में सैलाब नहीं आते है !
ये भी एक किस्म का संगीन रोग है देखो,
नींद आती है मगर ख्वाब नहीं आते है,नींद आती है मगर ख्वाब नहीं आते है !
यूँ तो दुनिया ने यहाँ मौत बिछा रखी है,बिछा रखी है.....
कुछ हमे जीने के अंदाज नहीं आते है!
मुददते बीत गयी ख्वाब नहीं आते है,
बे -अदब है इन्हें आदाब नहीं आते है !
फिर मिलेंगे,
पुनीत शुक्ला
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