Friday, September 26, 2008

घर

१६ मार्च २००५ ..आज एक अजीब वाक्या हुआ था .बात मेरे अपनों में से ही किसी एक कि है .एक घर था खुशियों से भरा हुआ ...लेकिन आज वो अधूरा हो रहा था..समय और हालातो के कारण एक कुटुंब अलग हो रहा था .. पता नहीं वो कौन से कारण थे..जिनके चलते ये हुआ था कि चार भाईयो का घर अब तीन का रह गया था ..न न दूसरे भाई ने अपनी मर्जी से अलग जाने का फैसला किया था ...घर के बाहर ट्रक मै सामान लोड हो रहा था ...और छोटे छोटे बच्चे ये सोंच कर खुश हो रहे थे की हम अपने घर जा रहे है.... कही न कही उस घर का हर सदस्य खुश था सिवाय एक के ....उस बूढी माँ के ...जिसकी आँखों मै शायद कही इस बात कि उम्मीद थी कि उसके घर के चारो तरफ से देखने वाली व्यंगात्मक नजरे अभी शर्म से झुक जायेंगी ...जब बेटा कहेगा माँ मै नहीं जाऊंगा, मै यही रहूँगा ....लोग कितना भी कहे कि इस मोहल्ले का माहौल ख़राब है...यहाँ रहकर मेरे बच्चे कुछ बन नहीं सकते...बेहतरी इसी मै है कि कही दूसरा घर ले लो ...अरे जब मै यहाँ इसी घर मै रहकर बन गया तो क्या मेरे बच्चे नहीं बनेगे......मै नहीं जाऊंगा .............लेकिन न ही बेटे ने ये कहा और न ही वो नजरे झुकीं, हां उस माँ कि आखों की उम्मीद को ट्रक के निकलते धुए ने ऐसे बादल से ढका कि जब वो हटे तो रह गयी थी सिर्फ उन आँखों कि वो गीले कोरे ...वो बूढी माँ वापस बढ़ चली अपने कमरे की ओर..देखते हुए घर के उस खाली हिस्से को जो कुछ कहता हुआ सा महसूस हो रहा था....उस घर के खालीपन ने नीचे लिखी पंक्तियों को जन्म दे दिया ....

दीवरो से नहीं अपनों से बनता है घर,गैरों से नहीं अपनों से बनता है घर ....

तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं लगता,न जाओ वापस आ जाओ लौटकर कहता है घर........

कैसे छोड़ दे एकदम से जिसे अपने खून से सींचा है,अपना सा प्यारा सा कुछ कहता हुआ जैसे लगता है घर ........

तुम मुझसे पराये क्यूँ हो गए ,ये सोंचता हुआ यही पूंछता हुआ फूट फूट कर रोता है घर ............

बाजार मै बिकने वाली कोई चीज नहीं है ये ,भावनाओ का आशाओ का अपेक्षाओं का घर होता है घर.........

दीवारो से नहीं अपनों से बनता है घर ...............
फिर मिलेंगे,
पुनीत शुक्ला

Wednesday, August 27, 2008

ख्वाब

अब जब अपने विचारो को मूर्त रूप देने का बीडा उठाया तो पता चला कि विचारो कि अभिव्यक्ति कितनी मुश्किल होती है ...उन सभी को मेरा हार्दिक अभिनन्दन जो लेखक है या किसी न किसी रूप में लिखते है...
लोग नींद न आने से परेशान है किन्तु हमारी परेशानी कुछ दूसरी है,हमे ख्वाब नहीं आते है.....

मुददते बीत गयी ख्वाब नहीं आते है,
बे-अदब है इन्हें आदाब नहीं आते है !

मेरी आँखों तुम्हे रोने का सलीका ही नहीं,सलीका ही नहीं ...
रोज रोज दरिया में सैलाब नहीं आते है !

ये भी एक किस्म का संगीन रोग है देखो,
नींद आती है मगर ख्वाब नहीं आते है,नींद आती है मगर ख्वाब नहीं आते है !

यूँ तो दुनिया ने यहाँ मौत बिछा रखी है,बिछा रखी है.....
कुछ हमे जीने के अंदाज नहीं आते है!

मुददते बीत गयी ख्वाब नहीं आते है,
बे -अदब है इन्हें आदाब नहीं आते है !

फिर मिलेंगे,
पुनीत शुक्ला

Sunday, August 24, 2008

कहा से शुरू करू समझ में नहीं आता, लिखने बैठता हू तो लगता है मानो किसी पंछी को २४ साल के बाद उन्मुक्त आकाश मिला हो .... बस उड़ने को जी चाहता है ..चलिए शुरू करता हूँ लिखने के शौक से ..कुछ सुनने और सुनाने के शौक से ...आज मै अपनी लिखी सबसे पहली पंक्तियाँ यहाँ पर लिख रहा हू ..... यकीनन १९९७ की डायरी से निकल कर २००८ के इन्टरनेट युग तक आते आते बहुत समय लग गया इन्हें...ये पंक्तिया मैंने लिखी थी अपने पिता के निधन के बाद ...उस अजीब सी उदासी के साए में जिनसे निकलने की शायद मै आज भी कोशिश कर रहा हू..


आज घर में अजीब सा सन्नाटा है....

.न वो हसने की आवाज,न पायलों की झनक,

न वो बजते हुए साज न वो चूडियों की खनक

किसी ने हरे भरे पेड़ को बड़ी बेदर्दी से काटा है

आज घर में अजीब सा सन्नाटा है ...

.न कदमो की आहट न आहटो की भनक,

न मुस्कुराना वो उनका , न वो चेहरे की चमक ,

किसी बच्चे को किसी बड़े ने बड़ी जोर से डाटा है,

आज घर में अजीब सा सन्नाटा है.....

जाने के बाद भी आती है उनकी महक,

जाने क्यों रह रह उठती है ये कसक,

आज भी मेरा उनसे जन्मो का नाता है..

आज घर में अजीब सा सन्नाटा है..

दिल कहता है तू आज उसी तरह चहक ,

सुबह के न सही शाम के सूरज सा दहक,

जैसे दर्पण में कोई खुद को निहारता है,

आज घर में अजीब सा सन्नाटा है...


आज के लिए इतना ही ...


फिर मिलेंगे ...
पुनीत शुक्ला




Tuesday, August 12, 2008

Armaan ko aaj bhi jid hai ki vo machal ke nikle......

Kisi kavi ki panktiya hai ......

Jaha daud lagani thi tahal ke nikle
Chand rangeen khilauno se bahal ke nikle..

Doob marne ke kayi mauke diye duniya ne hume
Hum ubhar aaye satah par bade halke nikle..

Door se noor ke nirjhar jo najar aate the
Paas jake dekha sabhi dhundhlke nikle..

Ye to bajar hai kharido ya becho kuch bhi
Hum bachaye hue emman sambhal ke nikle..

Jis sher ko sunkar sabhi shayar pareshan hue
Yakin jaane,vo sabhi sher meri gajal ke nikle..

Dil ne vo dard diya hai ki khuda khair kare
Armaan ko aaj bhi jid hai ki vo machal ke nikle......

Tujhse naraj nahi jindgi hairan hoo main..