बड़े दिनों बाद कल कोई ऐसा दिन गुजरा जब पूरे दिन के लिए मै घर पर था..श्रीमती जी ने इसका पूरा फायदा उठाते हुए दोनों दीवान साफ़ करने का फरमान जारी कर दिया...खैर मन मसोसते हुए शुरू की हमने अपने स्तर से सफाई....अभी शुरू ही किया था की किसी डायरी को एक बैग के नीचे से आधे झांकते हुए देख कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा .....ये डायरी थी उस समय की जब हम भी कुछ लिखने का शौक रखते थे ...पन्ने उलटने शुरू किये तो २९ अगस्त २००५ को लिखी हुई कविता सामने आ गयी ...वही कविता आपके साथ शेयर कर रहा हूँ ...
मैले कपड़ो में लिपटा वो;मांगता रेड लाइट पे भीख
फुटपाथ पे रेंगती जिन्दगी क्या यही है हमारे देश का भविष्य ?
अच्छे बुरे का एहसास नहीं उसको;देता तुम्हे अच्छे होने की सीख
किसी ढाबे में बाल श्रम करती जिन्दगी क्या यही है हमारे देश का भविष्य ?
टूटी साइकिल पर पानी ढोता वो ;मेहनताने के बदले पाता गाली और चीख
तंग गलियों में गोल घूमती जिन्दगी क्या यही है हमारे देश का भविष्य ?
नहीं उसे नहीं,देश नहीं ,युग नहीं ;अपने आप को बदलो
गलियों में,सडको पर,मोहल्लो में पलती ये ठोकरे हमे भी लगेगी वक्त से पहले संभलो
कर्तव्य,जिम्मेदारी,निष्ठां,ईमानदारी इन्हें अपनाओ खुद सुधरो बदलेगी तस्वीर ..........
बदलेगा देश का भविष्य ........
फिर मिलेगे
पुनीत
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